ऊर्जा: सुरक्षा एवं उपलब्धता
श्रद्धा मिश्रा
अर्थशास्त्र अध्ययनशाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर (छत्तीसगढ़)
सामान्य रूप से ऊर्जा सुरक्षा का अर्थ है वाजिब कीमत पर पर्याप्त मात्रा और विभिन्न रूपों में ऊर्जा की उपलब्धता। भारत को ऊर्जा सुरक्षित तब कहा जाएगा जब इसके सभी नागरिकों को उनकी अदायगी क्षमता में भेदभाव के बिना, ऊर्जा रूपी जीवन रेखा सुनिश्चित होगी। उनके आर्थिक विकास के लिए ऊर्जा की जरूरी मांग उनकी सुरक्षित और सुविधा जनक तरीके से पूरी की जा सकेगी। यह हर समय स्पर्धात्मक मूल्य पर वांछनीय आत्मविश्वास के स्तर पर मिल सकेगा और ऊर्जा उपलब्धता में संभावित बाधाओं का ध्यान रखा गया है।
अर्थव्यवस्था के विकास की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए सुवहनीय ऊर्जा संसाधनों की उपलब्धता आवश्यक है। भारत में विविधीकृत संसाधन आधार और भिन्न- भिन्न भौगोलिक परिस्थितियां क्षेत्र और सेक्टर- विशिष्ट ऊर्जा संसाधन आयोजना की मांग करती है। इस संदर्भ में नीति को अर्थव्यवस्था में ऊर्जा की समग्र मांग को भरोसे पूर्वक पूरा करने की आवश्यकता है। इस प्रकार ऊर्जा और आधारभूत सुविधा से संबंधित मुद्दे किसी विकास रणनीति का मूल है।
कोयले की उपलब्धता वाले अन्य देशों की तुलना में भारत में कोयला निकालने की क्षमता का पर्याप्त रूप से दोहन नहीं किया गया है। खनिज संपदा की खोज और खदानों के संचालन की ओर निजी निवेश की आकर्षित करने के लिए खदान और खनिज अधिनियम, खनिज रियायत नियम और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की नीति में कई अवसरों पर संशोधन किए गए हैं। लेकिन अब तक अल्प निवेश किया गया है। खनन से संबंधित कार्य में भू- अधिग्रहण और पुर्नस्थापन की समस्याओं से रूकावट आती है और कोयले को उसके उपयोग स्थानों पर पहुचाने की भी समस्या है। अन्य समस्याएं घरेलू कोयले की हल्की गुणवत्ता के बढ़ते मूल्यों से संबंधित है। ‘एकीकृत ऊर्जानीति समिति’ (अध्यक्ष: किरीट पारेख, दिसम्बर 2005) ने कोयले के आयात को बढ़ावा देने, घरेलू उत्पाद को बढ़ाने कि लिए केन्द्रीय/राज्य/सार्वजनिक क्षेत्र के यूनिटों को कोयले के ब्लाॅक आबंटित करने तथा केप्टिव खदानों को अंतिम उपयोगकर्ताओं को आबंटित करने की बात कही। इन प्रयासों के बावजूद केप्टिव खदानों के मामले में अपेक्षित प्रगति नहीं हुई।
लक्ष्य से कम बिजली और क्षमता विस्तार की धीमी गति के परिणामस्वरूप बिजली ंक्षेत्र में, बिजली की कमी (10 प्रतिशत वार्षिक) चिंता का विषय है, जबकि दूसरी ओर मांग में वृद्धि तेज गति से हुई है। पुरानी ग्रिडों, पुरानी मशीनरी और टेक्नोलाॅजी और बिजली की चोरी के कारण होने वाली उच्च ट्रांसमिशन और वितरण हानियां तथा कम संयत्र लोड फैक्चर (तापीय बिजली घरों के लिए 65 प्रतिशत) संबंद्ध समस्याएं हैं। अत्यधिक पूंजी प्रधान होने के अलावा संयंत्र के नूतनीकरण और आधुनिकीकरण के लिए अनिवार्य रूप से बिजली बंद करने में उत्पादन गतिविधियां रूकती है। कोल हैण्डलिंग, ऐश हैण्डलिंग और प्री- हीटिंग प्लांट जैसे सहायक प्लांट का बिगड़ता संतुलन नए थर्मल प्लांटो को वाणिज्यिक स्तर पर संचालित करने के कार्य में बाधा उत्पन्न करता है।
इस क्षेत्र को विकसीत करने कार्य के लिए विभिन्न मोर्चों पर सरकार द्वारा किए गए उपायों में शामिल है।निजी क्षेत्र के स्वावलंबी ऊर्जा निर्माताओं (आईपीपी) व्यापारी ऊर्जा निर्माताओं (एमपीपी) और निजी क्षेत्र के केप्टिव पावर प्लांटो को प्रोत्साहित करना फिर भी आपूर्ति में उनका योगदान कुल क्षमता का 8.4 प्रतिशत है। पावर ट्रेडिंग, वर्तमान क्षमता के उपयोग में वृद्धि करने बिजली के कमी को टालने और पावर यूटिलिटी तथा उपभोक्ताओं के लिए बिजली मूल्य में कमी लाने का प्रयास कर रही है, किंतु यह अभी आरंभिक अवस्था में है। बिजली अधिनियम, 2003 के उपबंधो के अनुसार व्यापार अब लाइसेंसीकृत और विनियमित कार्य है। इससे बिजली का नए ढंग से मूल्य निर्धारित करने में मदद मिलेगी जिसके परिणामस्वरूप प्रतिस्पर्धा करने में मदद मिलेगी जिसके परिणाम स्वरूप प्रतिस्पर्धा आएगी और बिजली की दरों में कमी आएगी और बिजली की दरों में कमी आएगी। इसके अलावा, किरीट पारेख समिति की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बिजली की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए देश में उपलब्ध विशाल थोरियम स्त्रोतों का उपयोग करके परमाणु ऊर्जा सुविधा केन्द्र स्थापित किए जाएं। हालांकि लगभग सभी बड़े राज्यों ने विभिन्न सुधार प्रक्रियाओं को कार्यान्वित किया है और उसने राज्य विद्युत विनियामक आयोग का गठन, राज्य विद्युत बोर्डों का विघटन और टेरिफ आदेश जारी करने जैसे उपायों को अपनाया है फिर भी अभी कुछ वास्ताविक समस्याएं है, जिन्हें इस परिप्रेक्ष्य में सुलझाया जाना है। वांछित परिणाम अभी दूर हैं, क्योंकि सुधार प्रक्रिया को मूलतः अपनाया नहीं गया है और अंतराल शेष है।
विकास और प्रगति के साथ देश की ऊर्जा की आवश्यकता बढ़ती रहेगी। हमारे पास अधिकांश प्रकार के ऊर्जा के स्त्रोत कम है। अगर देश की दीर्घावधि ऊर्जा आवश्यकताओं के अनुमानों पर ध्यान दें तो स्पष्ट होगा कि सभी घरेलू संसाधनों के अधिकाधिक उपयोग के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है। हमारे देश में तेल और गैंस के बड़े भण्डार नहीं है। देश में कोयले के भंडार अनंत होने की बात भी सहीं नहीं है क्योंकि आजकल जितना कोयला निकाला जा रहा है, उस हिसाब से यह 45 से 50 साल से अधिक नहीं चलेगा। परमाणु खनिजों के कम उपलब्धता के कारण परमाणु ऊर्जा का भी सीमित विकास ही संभव है। सौर ऊर्जा की टेक्नोलाॅजी अभी इतनी उन्नत नहीं हो पाई है कि इसे ऊर्जा के बड़े स्त्रोत के रूप में इस्तेमाल किया जा सके। जनसंख्या के दबाव के चलते पनबिजली स्त्रोत सीमित हैं और इनसे 2030 तक हमारी वार्षिक आवश्यकता की बिजली का सिर्फ 10 प्रतिशत ही मिल पाएगा।
ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए हमें जोखिमों पर ध्यान देना होगा। भारत की ऊर्जा जरूरतें बढ़ रही है और इन्हें पूरा करने के लिए हमें आयात पर निर्भर रहना पढ़ रहा है। ऊर्जा आयात में रूकावट का जोखिम हमेशा बना रहता है। यह जोखिम आपूर्ति बाजार अथवा तकनीकें हो सकता है। आपूर्ति का जोखिम तब होता है जब आपूर्ति उपलब्ध नहीं होती, हालांकि आप उसकी खरीद के लिए पैसे खर्च करने के लिए तैयार होते हैं। ऊर्जा सुरक्षा को मात्र आपूर्ति जोखिम से खतरा नहीं होता, आयातित ऊर्जा की उपलब्धता में अनिश्चय का खतरा भी होता है, साथ ही घरेलू उत्पादन में कमी हो जाने के कारण भी यह खतरा हो सकता है। देश के अन्दर भू- राजनीतिक स्थिति या समुद्री रास्ते में खतरा होने से भी आपूर्ति में बाधा आ सकती है। अगर आपूर्ति में बाधा न भी पड़े तो एकदम से कीमत बढ़ जाने से बाजार का जोखिम पैदा हो सकता है। देश में पर्याप्त ऊर्जा संसाधनों के बावजूद तकनीकी विफलताओं के कारण भी आपूर्ति मंे बाधा आ सकती है। जनरेटर फेल हो सकते है, पारेषण लाइने टूट सकती हैं या तेल की पाइपलाइनों में रिसाव हो सकता है।
उत्पादन और इस्तेमाल में कुशलता बढ़ाकर, आयातित ईंधन की जगह घरेलू ईंधन का प्रयोग करके, ईंधन चयन में विविधता लाकर (गैंस, इथेनाॅल आदि) और आपूर्ति के स्त्रोत खोजकर तथा घरेलू ईंधन स्त्रोतों का विस्तार करके जोखिम कम किया जा सकता है। रणनीति आरक्षित भण्डार बना और आपूर्ति लाइन की खामियां दूर करके तथा कमी का सामना करने की क्षमता बढ़ाकर भी जोखिमों का सामना किया जा सकता है।
भारत में नवीनीकरणीय ऊर्जा विकल्पों के बीच हाइड्रोपावर उत्पादन की हिस्सेदारी कुल स्थापित क्षमता का 24.7 प्रतिशत है और अन्य नवीनीकरणीय ऊर्जा (पवन ऊर्जा, लघु जल परियोजना, बायोमास पावर आदि) की हिस्सेदारी केवल 7.7 प्रतिशत है जबकि क्षमता इससे कहीं अधिक है। लगभग एक लाख मेगावाट हाइड्रोपावर क्षमता का उपयोग नहीं हो पा रहा है। परमाणु ऊर्जा क्षमता, जो कुल बिजली निर्मित का 2.9 प्रतिशत है। वर्तमान में यूरेनियम की कमी का सामना कर रही है। परिणाम स्वरूप प्लांट अपने प्लांट लोड क्षमता के केवल 50 प्रतिशत तक परिचालन कर पा रहे हैं।
2007-2008 के दौरान, कच्चे तेल का घरेलू उत्पादन घरेलू तेल की मांग (रिफाइनरी कू्रड थ्रूपुट) का लगभग 22 प्रतिशत का पूरा कर सका। तेल की बढ़ती कीमतों से आयात बिलों में अचानक वृद्धि हुई है। कीमतों में जरा सी भी वृद्धि करने से मुद्रास्फीति में वृद्धि और राजकोषीय असंतुलन हो जाता है। घरेलू क्रूड आॅयल क्षेत्र को वर्तमान में काफी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। जैसे आयल फील्ड में एयर इंजेक्शन रोकना, नाम मात्र क्षमता में वृद्धि, पर्यावरण संबंधि मामले, नये कुओं से अपेक्षा से कम लाभ मिलना, अल्प आधार शक्ति, एक्सप्लोरेटरी ड्रिलिंग योजना का अनुमान से कम योगदान और रूकावटें/ स्थानीय समस्याएं। इसके विपरीत, देश में पेट्रोलियम रिफाइनरी क्षमता में अच्छी वृद्धि हुई और भारत ने पीओएल उत्पाद केवल शुद्ध रूप से निर्यात किए।
ऊर्जा क्षेत्र की चुनौतियां दिखाई तो दे ही रही हैं जिसमें, अन्य बातों के साथ साथ शामिल है- ऊर्जा परियोजनाओं का वित्तपोषण बाजार में सुधार की अधिक आवश्यकता (गैस तथा पावर क्षेत्र में) और प्रोत्साहित निवेश। समस्याओं को सुलझाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं कि इस क्षेत्र से जुड़ी गतिविधियों को मजबूत बनाने और उन्हें समेकित करने के दृष्टि से व्यवहार्यता को देखते हुए मिले जुले सार्वजनिक निजी भागीदारी (पीपीपी) और पूर्ण निजी निवेश को बढ़ावा दिया जाए।
देश में ऊर्जा की आपूर्ति लगातार बनाए रखने के कुछ अन्य उपाय इस प्रकार है- घरेलू संसाधन आधार का विस्तार करना विदेशों में ऊर्जा स्त्रोत खरीदना, गैस आयात के लिए पाइप लाइन बिछाना, एलएनजी टर्मिनलों का निर्माण करना, मांग पूर्ति के अंतर को पाटने के लिए ऊर्जा आयात की निरंतरता सुनिश्चित करने हेतु राजनयिक प्रयास करना तथा ऊर्जा का आयात बढ़ाने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाना भी महत्वपूर्ण उपाय है।
भारत की प्रमुख समस्या यह है कि सब को बिजली और स्वच्छ इ्र्रंधन कैसे उपलब्ध किया जाए। यह काम ग्रामीण आबादी के लिए निश्चय ही खासतौर से महत्वपूर्ण है क्योंकि उनकी अदायगी क्षमता कम है। स्थानीय संसाधन सीमित है और देश की जनसंख्या काफी अधिक है। बायोमास और गोबर इकट्ठा करने तथा प्रसंस्कृत करने में जो मेहनत लगती है। उसे इस ऊर्जा की लागत में शामिल नहीं किया जाता है। इस इंधन से धुआं और घर में प्रदूषण होता है। ये इस्तेमाल में असुविधाजनक है और लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा असर डालते हैं। इन्हें इकट्ठा और प्रसंस्कृत करने की मुख्य जिम्मेदारी बच्चों और महिलाओं को उठानी पड़ती है। अतः इस चुनौती का सामना शीघ्रातिशीघ्र करने की जरूरत है। इनका निवारण बालिकाओं की शाश्वत शिक्षा लक्ष्य की प्राप्ति, लिंग समानता लाने और महिला सशक्तिकरण के लिए भी जरूरी है। जीवन यापन के लिए स्वच्छ ईंधन की आसानी से उपलब्धता एक बुनियादी जरूरत है। व्यक्तिगत स्तर पर ऊर्जा सुरक्षा का निहितार्थ यही है कि आवश्यक ऊर्जा की निरंतरता सुनिश्चित की जाए। भारत तब तक ऊर्जा सुरक्षा नहीं प्राप्त कर सकता जबतक जनता जरूरत भर ऊर्जा आपूर्ति के लिए निश्चित नहीं हो जाती। इसके लिए लक्षित सब्सिडी की जरूरत पड़ेगी क्योंकि अनेक परिवार सुरक्षित, स्वच्छ और सुविधाजनक व्यापारिक ऊर्जा की कीमत अदा करने में समर्थ नहीं है। स्पष्ट है कि देश और देशवासियों को ऊर्जा सुरक्षा प्रदान करने के लिए अनेक उपायों की जरूरतें है और इनसे लगभग पूरे देश को लाभान्वित किया जा सकता है।
संदर्भः
1. भारत सरकार (2005), एकीकृत ऊर्जा नीति पर विशेषज्ञ समिति की मसौदा रिपोर्ट दिसम्बर।
2. भारत सरकार, (2006), अधिक गतिशील और अधिक समावेशी प्रगति की ओर, 11 वीं पंचवर्षीय योजना के प्रति दृष्टिकोण नवंबर।
3. भारत सरकार, भारतीय कोयला परिदृश्य पर विविध रिपोर्टः 2007-08- एक समीक्षा, कोयला नियंत्रक कार्यालय।
4. ऊर्जा मंत्रालय, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय और केन्द्रीय विद्युत प्राधिकरण भारत सरकार की वेबसाइट
5. वार्षिक वित्तीय रिपोर्टः 2007-08, भारतीय रिजर्व बैंक
6. योजना, प्रकाशन विभाग सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार
Received on 26.03.2013
Revised on 20.04.2013
Accepted on 29.04.2013
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Research J. Humanities and Social Sciences. 4(2): April-June, 2013, 220-222